Wednesday, January 25, 2017

फ़िल्म पांच में से 3 स्टार्स पाने के काबिल है

                                                  
यह फ़िल्म एक बार तो देखनी बनती है.






लंबे अरसे बाद ऋतिक रोशन के हाथ कोई अच्छी फिल्म लगी है, वैसे इस फिल्म के डायरेक्टर संजय गुप्ता हैं, तो हो सकता है ये किसी विदेशी फ़िल्म की कॉपी हो. 'काबिल' की कहानी दो प्रमियों की है, जिनकी आंखों की रोशनी नहीं है. रोहन और सुप्रिया भले ही एक दूसरे को देख नहीं सकते, मगर एक दूजे से बेइंतहा प्यार करते हैं.

रोहन-सुप्रिया की खुशहाल ज़िंदगी बिखर जाती है, जब दो बदमाश सुप्रिया का रेप करते हैं. पॉवरफुल नेताओं और सिस्टम से जब न्याय नहीं मिलता तो सुप्रिया आत्महत्या कर लेती है. फ़िल्म में आगे की रोमांचक कहानी अंधे रोहन की है, जो माधव और अमित नाम के इन रईसों से बदला लेता है.

हालांकि काबिल एक रेग्युलर रिवेंज ड्रामा है, लेकिन यह फिल्म अंत तक दर्शकों को सीट से बांधे रखती है. भुल्लकड़ गजनी का ये अंधा स्वरुप है, लेकिन इसमें कई नए और दिलचस्प मोड़ हैं. ऋतिक और यामी के करियर का ये एक शानदार परफ़ॉमेंस है, वहीं रोनित और रोहित रॉय विलेन के किरदार में ज़बरदस्त है.
बीटीडीडी फ़िल्म रिव्यू फॉर्मूले पर हमने काबिल की अच्छाईयों और कमियों को जोड़ा घटाया और पाया है कि यह फ़िल्म पांच में से 3 स्टार्स पाने के काबिल है, यह फ़िल्म एक बार तो देखनी बनती है.

रईस’ को मिलते हैं पांच में से तीन स्टार!

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रईस’ की शुरुआत में एक सीन है, जिसमें 10-12 साल का रईस अपनी कमजोर आंखों के लिये गांधी जी के स्टेच्यू से चश्मा उतार लेता है. शराबबंदी के नाम पर गुजरात में आज तक जो कुछ हो रहा है, यह सीन उस पूरे तंत्र पर एक टिप्पणी है. तो जी खैर, विवादित कहानी, पाकिस्तानी कलाकार, मनसे की धमकी, ट्रेन में सफर, इतने सारे हो-हल्ले के बाद आखिरकार ‘रईस’ आ ही गया. लेकिन इस रईस को देखने के बाद मुंह से निकला- 'मियांभाई, जितने रईस दिखते हो उतने हो नहीं!'


‘रईस’ कहानी है अस्सी और नब्बे के दशक की, जिसमें रईस आलम (बेशक शाहरुख़! ये तो अब मंगल ग्रह वाले भी जान गये होंगे), अपनी मां के साथ बदहाल जिंदगी गुजार रहा है. वो बचपन से ही अवैध शराब के कारोबारी जयराज के लिए काम करने लगता है. इस काम में उसका दोस्त सादिक़ (मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब) हर कदम पर उसके साथ है. धीरे-धीरे वो अवैध शराब के धंधे का बड़ा खिलाड़ी बन जाता है. इतना बड़ा कि चीफ मिनिस्टर के यहां भी उसकी सीधी पहुंच है.


कुल मिलाकर ‘रईस’ शाहरुख़ के फ़ैन्स के लिये एक पैसा-वसूल मूवी है. लेकिन यह एक आम गैंगस्टर/माफिया डॉन की मूवी बनकर रह जाती है, जो दर्शकों को कुछ भी नया नहीं परोसती. इसकी कहानी तो नब्बे के दशक की है ही, प्रस्तुतीकरण भी नब्बे के दशक जैसा ही है. उतार-चढ़ावों से रहित एक सीधी-सपाट कहानी. इसके ट्रेलर और पब्लिसिटी ने जो उम्मीदें जगाईं थीं, यह उनसे उन्नीस ही रह जाती है. फिर भी शाहरुख़-नवाज़ की परफॉर्मेंस की वजह से ‘रईस’ को मिलते हैं पांच में से तीन स्टार!
(साभार- फर्स्टपोस्ट)